tag:blogger.com,1999:blog-16228145083370806782008-03-11T12:46:08.532+05:30कुछ अनकही सी...Kuch Ankahi Si...Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comBlogger15125tag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-33934522118081118942007-08-31T11:54:00.000+05:302007-08-31T12:12:57.182+05:30परदापरदा बहुत कुछ कहता है,<br />परदा कई रूप धरता है,<br />कभी पर्दा मुखोटा बन जाता है,<br />कभी आवरण,<br />शरहद की लाइनें भी परदा है,<br />परदे के बहुत मायने है,<br />परदा मर्यादा है,<br />परदा वादा है,<br />परदा संजोता है <br />धरोहर अपने आप में. <br /><br /><a href="http://yl.blogspot.com/2007/08/blog-post_30.html">पर शब्द परदा नही है</a> <br />परदा ही शब्दों का रूप धरता है <br />और कहता है रोज़ <br />कुछ अनकही सी...Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-51363447071439952392007-08-30T09:29:00.001+05:302007-08-30T09:29:20.145+05:30प्रथ्वीग्रहणचाँद, सूरज और प्रथ्वी <br />सब फसे है एक चक्कर में <br />जैसे रिश्तेदार हों एकदूसरे के <br />सूरज रोज़ निहारता है <br />प्रथ्वी को <br />प्रथ्वी रोज निहारती है <br />चाँद को,<br />सब बतियाते है <br />एक दूसरे से <br />दूर से- पास से <br /><br />आए दिन ये <br />एक सीध में पकड़े जाते है <br />लोग इहे बदनाम करते है <br />सूर्यग्रहण-चंद्र्ग्रहण के नाम से,<br />किस्से कहानियाँ बन जाते है<br />ज्योतिसियों के लिए,<br />जिन्हे झेलती है प्रथ्वी.<br /><br />पर कभी प्रथ्वी को <br />ग्रहन क्यो नही लगता.<br />लगता होगा <br />सूरज के घर <br />चाँद के घर <br />प्रथ्वीग्रहण...Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-69631330708754947882007-08-17T12:57:00.000+05:302007-08-17T13:08:10.428+05:30तस्वीरचित्रकार जब देखता हैं<br />सुने से कैनवास को<br />तो उडेल देता हैं<br />रंग सारे<br />अपनी पेलेट के<br />और बना देता हैं<br />एक तस्वीर,<br />अपने अन्दर की<br />अपने बाहर की ,<br />जो कितनी खूबसूरत<br />दिखाती हैं<br />सतरंगी सी<br /><br />एक हैं ये लिखने वाले<br />जो मन की<br />एक सियाही से<br />लिखते हैं,<br />अपने अन्दर की<br />अपने बाहर की<br />और खीच देते हैं<br />सिर्फ शब्दों से<br />एक तस्वीर<br />कुछ कही सी<br />कुछ अनकही सीYatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-60900615132433056012007-08-09T08:15:00.000+05:302007-08-09T08:30:16.798+05:30रंगीन पानीपानी इतना आम हैं<br />कि इसका कोई नाम नहीं,<br />ये ज़रूरत हैं हर किसी की<br />हर दिन,<br />पर जब मिलता हैं<br />कुछ रंग इसमें<br />तो शक्ल बदल जाती हैं,<br />ये बेनाम नही रहता।<br />जब ये अन्दर जाता हैं<br />तो बाहर आता हैं<br />ऐसा-ऐसा<br />जो कह नही पाते<br />साफ पानी पीकर।<br />सारी घुटन<br />सब जान जाते हैं।<br />ये रंगीन पानी<br />सब कह जाते हैं <br />मन की,<br />जो थी अब तक<br />कुछ अनकही सी...Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-67025302340524840622007-08-02T12:01:00.000+05:302007-08-02T22:55:35.525+05:30किश्तियों के वो कागज़वो जो कान मे पडती थी<br />बूंदों की टपटप<br />और आँख खुलती थी<br />तो लगता था<br />टीन पे बूंदे नही पड रही<br />क़ोई नाच रहा है.<br />सावन ने घुँघरू बाँधे है<br />पावों मे,<br /><br />दीवारो से जब रिसता था<br />वो पानी<br />तो महक उठता था<br />सारा आलम सोंधी खुशबू से<br />और वो कच्ची मिट्टी को<br />छूती थी जो बूंदे<br />तो खडे हो जाते थे<br />खरपतवार,<br />वो खरपतवार एसे लगते थे<br />जैस एक घना जंगल,<br />केचुए जैसे एनाकोन्डा,<br />चीटे-चीटी जैसे जंगली जानवर,<br />मन्डराते कीडेमकोडे<br />जैसे पंक्षी हो बड़े बड़े.<br /><br />बडे होने पे<br />आज देखता हू<br />उन बूंदो को<br />इस महानगर मे,<br />शान्त सी चली आती है<br />और चली जाती है<br />नालियो मे बह,<br />और किश्तियों के वो कागज़<br />अपना दम तोड देते है<br />स्कूल के बस्तो मे...Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-45737068621866299882007-07-06T22:46:00.000+05:302007-08-02T02:05:39.157+05:30चाह<span style="font-size:100%;">चाह की कोई सीमा नहीं होती,<br />चाहते कितनी भी हो सकती हैं।<br />मन जब मचलता हैं<br />तो चाहतें जन्म लेती हैं,<br />पर सच्ची चाहत का जन्म<br />बिना शर्त होता हैं,<br />किसी की कमियों को<br />साथ लिए<br />उसे चाहना ही<br />सच्चा प्यार हैं।<br /><br />ज़िन्दगी एक बार<br />मिलती हैं,<br />अपने खेल खेलती हैं,<br />हर रोज़ नयी कहानी<br />जन्म लेती हैं,<br />इसमें कोई भी<br />मन सा कभी भी<br />मिल सकता हैं,<br />और कभी मन सा<br />बनाना पड़ता हैं।<br /><br />सच्ची चाहत को<br />बयाँ करना आसान नही हैं,<br />आसान हैं उसे महसूस करना<br />ग़र ज़िंदगी देती हैं ये मौका।<br /><br />कभी लंबे साथ भी अधूरे रहते हैं<br />कभी कुछ पल के साथ हमेशा रहते हैं...</span>Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-44244587948214405292007-06-18T14:30:00.000+05:302007-08-02T02:21:43.155+05:30सांझे गम<span style="font-size:110%;">कूलर पानी लेता हैं<br />ठंडक देता हैं,<br />AC पानी छोड़ता हैं<br />ठंडक देता हैं,<br />दोनो का ही काम<br />ठंडक देना हैं<br />एक का लेकर;<br />दूसरे का देकर;<br />'पानी'<br /><br />गम भी कुछ<br />इसी तरह <span class="">हैं,</span><br />कुछ गम लेने से<br />ठंडक मिलती हैं<br />कुछ बांटने से।<br />दोनो ही सूरत<br />सुकून देती हैं<br />यही होते हैं<br />"सांझे गम"</span>Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-50008131170811895182007-06-11T23:18:00.000+05:302007-08-02T12:27:30.799+05:30पहेली<span style="font-size:110%;">ज़िंदगी कहते हैं तू पहेली हैं,<br />वक़्त की आंख मिचोली हैं।<br /><br />हरेक दिन रचती हैं नये खेल,<br />फिर भी सुख दुःख की सहेली हैं।<br /><br />रोज़ होती हैं तू परत दर परत पुरानी,<br />फिर भी लगती तू नयी नवेली हैं।<br /><br />कितने वाकये जुडते हैं इसमें नए,<br />फिर भी यादों की तू हवेली हैं।<br /><br />ज़िंदगी कहते हैं तू पहेली हैं...<br /><br />2004</span>Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-24751401286443740972007-06-02T01:21:00.000+05:302007-08-02T11:27:53.135+05:30आओ कुछ रंग बांटे<span style="font-size:110%;">शब्दों मै भी तो रंग होते हैं,<br />या कहें हर शब्द एक रंग का नाम हैं,<br />तभी तो गीत, कहानी, ग़ज़ल, कविता<br />कितने रंग लिए होते हैं अपने आप में।<br /><br />सभी रंग दिखाई नही देते;<br />महसूस भी किये जाते हैं,<br />सुख-दुःख, ख़ुशी-गम<br />और ना जाने कितने...<br /><br />ये रंग ही तो हैं<br />जिनसे ज़िन्दगी चलती हैं,<br />ये ना हों<br />तो कुछ भी नहीं।<br /><br />आओ रंग बांटे,<br />आओ संग बांटे,<br />खुशियाँ तो बहुत बाँटी हैं,<br />आओ कुछ गम बांटे...<br /></span><span style="font-size:100%;color:#990000;">10/03/2001</span>Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-45509289313662766502007-05-30T01:12:00.000+05:302007-08-02T12:28:15.742+05:30पार्टी टाइम<span style="font-size:110%;">जरुरी है कि खुशियों के लिए<br />दिन देखा जाये,<br />जरुरी है क्या उस दिन का<br />इंतज़ार करना,<br />जब कुछ हुआ था।<br />क्यों ना हम उन तारीखों के<br />फ़ासलों को कुछ कम करलें,<br />जन्मदिन की पार्टी<br />किसी और दिन भी धरलें,<br />एक वक़्त से पहले,<br />एक वक़्त के बाद ...</span><br /><span style="color:#990000;">13/6/2004</span>Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-31258223696357617882007-05-27T00:15:00.000+05:302007-08-02T11:28:12.377+05:30फ़ासले<span style="font-size:110%;">दूरियाँ और नजदीकियां<br />फ़ासलों के ही नाम है।<br />जब ये ज्यादा होता है<br />तो दूरियाँ बनता है,<br />और कम होता है<br />तो नजदीकियां।<br />ये फ़ासले भी कितने अजीब होते है<br />कहने को एक है,<br />पर रिश्ते दो - दो होते है।<br /></span><span style="font-size:85%;color:#990000;">March 2001</span>Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-33973583852761344122007-05-25T23:22:00.000+05:302007-06-02T01:45:06.151+05:30सपना<span style="font-size:130%;">रात फिर आयी </span><span class=""><br /><span style="font-size:130%;">एक</span></span><span style="font-size:130%;"> मीठी याद की तरह,<br />छेड़ गयी तारों को<br />जो उल्झाये थे संग किसी के।<br /><br />आज हमने फिर एक सपना <span class="">देखा</span>।</span><br /><span style="font-size:78%;">२८-२-1995</span>Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-90013150470675548452007-05-25T22:41:00.000+05:302007-08-03T00:03:01.134+05:30तुमतुम खडे हो मेरे सामने<br />एक सवाल बनके,<br />मेरे सवाल का<br />जवाब बनके<br />जो मैंने अपने आप से किया था...<br /><span style="font-size:78%;">२७/2/1995</span>Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-89974903283587591292007-05-25T20:53:00.000+05:302007-08-02T12:59:54.701+05:30मेरी वोतुम नहीं हो तो नाहोना सताता है,<br />तुम होती हो तो होना सताता है,<br /><br />मै तुम्हें कितना सताता हूँ ये अलग बात है...Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1622814508337080678.post-16363896002598098492007-05-24T00:12:00.000+05:302007-08-03T00:04:41.239+05:30गुमनाम है कोई<div align="center">कुछ रिश्तों के नाम होते है ,<br />पर वो हमेशा नाकाम होते है ।<br /></div><div align="center"></div><div align="center">कुछ रिश्ते रोज दिखते है,</div><div align="center">पर उनमें देखने वाली कोई बात नही होती ।</div><div align="center">और </div><div align="center">कुछ रिश्ते दिखाई नही देते </div><div align="center">पर वो हमेशा साथ होते है ।</div><div align="center">काश कि सबको एक ऐसा रिश्ता मिले </div><div align="center">जिसे नाम ना देना पडे </div><div align="center">जो गुमनाम भी ना हो </div>Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.com