ज़िंदगी कहते हैं तू पहेली हैं,
वक़्त की आंख मिचोली हैं।
हरेक दिन रचती हैं नये खेल,
फिर भी सुख दुःख की सहेली हैं।
रोज़ होती हैं तू परत दर परत पुरानी,
फिर भी लगती तू नयी नवेली हैं।
कितने वाकये जुडते हैं इसमें नए,
फिर भी यादों की तू हवेली हैं।
ज़िंदगी कहते हैं तू पहेली हैं...
2004
11 June 2007
पहेली
Posted by
Yatish Jain
at
11:18 PM
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5 comments:
यतीश जी, आपने इस कविता में लगता है मेहनत नहीं की है। कहने का तरीका थोड़ा नया हो, आपकी अपनी शैली हो। यहाँ केवल लाइनें जोड़ी गई हैं।
ज़िंदगी कहते हैं तू पहेली हैं...
--बहुत सुंदर भाव हैं, यतिश भाई.
Superb! I am impressed the way you pen down your opinion about life and described it in such a wonderful way. Quite impressive and logical. Good job Yatish.
sachmuch ye paheli hi hai... sundar
हाँ ठीक ही लिखा है जिंदगी पहेली ही तो है...बात पुरानी है मगर मगर ये एक ऐसा सच है जो सार्वभौमिक है जिंदगी हमेशा से पहेली ही रही है और रहेगी...
शानू
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